आज की पोस्ट में हम जानेंगे एक लावारिश से डॉग की सड़क से अंतरिक्ष तक के सफर की कहानी, जिसने आज के आधुनिक युग के अंतरिक्ष अभियानों की तस्वीर को बदलने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। आज की पोस्ट इनफॉर्मेटिव होने के साथ-साथ बेहद चौका देने वाली, तो पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़ें।
आज के वक्त में हम इंसान तकनीकी रूप से बहुत ज्यादा विकसित हो चुके हैं। हमने पृथ्वी पर कितनी सारी मॉडर्न से मॉडर्न हाईटेक टेक्नोलॉजी से परिपूर्ण लैब्स बनाई है। जिनमें ना जाने कितने सारे प्रयोग किए जाते हैं। इन प्रयोगों से हर क्षेत्र में इंसानों को काफी फायदा होता है। चाहे वह मेडिकल की फील्ड हो। स्पेस की फील्ड हो या कोई भी फील्ड हो। लेकिन दुनिया में कुछ ऐसी लैब्स मौजूद हैं जो इंसानों की मदद तो नहीं करती पर मुश्किलें जरूर बढ़ा देती हैं। और दुनिया में क्या चल रहा है, ये आपके सामने ही है और यह किसकी करतूत है? ये शायद ही किसी को बताने की जरूरत है।
खैर दुनिया इतनी बड़ी है तो कुछ ऐसे लोग होते हैं जो सिर्फ अपना ही फायदा सोचते हैं। पर वह लोग जिन्हें इंसानी सभ्यता का भला करना है। आगे ले जाना है। उन्होंने कई ऐसे कारनामे किए हैं कि जिन्हें करना एक वक्त असंभव सा लगता था अब इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को ही देख लो। कभी सोचा था कि अंतरिक्ष में हमें ऐसी चीज बना देंगे, जिसमें इंसान कई महीनों के लिए रह पाएगा और वहां पर प्रयोग भी कर पाएगा। कभी नहीं लेकिन हमने कर दिखाया। आज के वक्त अंतरिक्ष में जाना और लौट के वापस आना उतनी बड़ी चीज नहीं रही हैं।
नासा जैसी बड़ी स्पेस एजेंसी तो चांद और मंगल पर इंसानों को भेजने की और बाद में उन पर परमानेंट बेस बनाने की जोरों शोरों से तैयारी कर रही है। लेकिन जिस तरह घर बनाते वक्त घर के बेस को सबसे ज्यादा मजबूती से बनाया जाता है। ताकि ऊपर का सारा स्ट्रक्चर सालों साल तक मजबूती से टिका रहे। उसी तरह हमारी अंतरिक्ष अभियान का बेस यानी की शुरुआत भी कहीं ना कहीं मजबूती से होने की जरूरत थी। ताकि आगे आने वाली मिशंस को करने में उत्साह और जोश पाए। और इसका बीड़ा उठाया सोवियत यूनियन यानी आज की रशियन स्पेस एजेंसी rascosmos ने उसने 4 अक्टूबर 1957 को दुनिया की पहली सैटेलाइट SPUTNIK 1 सफलतापूर्वक लॉन्च कर दी।
उस समय अमेरिका और सोवियत यूनियन के बीच कोल्ड वॉर चल रहा था, जहां दोनों देश अंतरिक्ष के क्षेत्र में कुछ अविश्वसनीय करके अपनी ताकत की जोर आजमाइश दुनिया के सामने कर रहे थे। शुरुआत में सोवियत यूनियन अमेरिका पर भारी पड़ रहा था। और उसकी सोच भी कहीं ना कहीं अमेरिका के मुकाबले काफी सुपीरियर थी। क्योंकि सोवियत यूनियन का असली मकसद अंतरिक्ष में सैटेलाइट या बाकी चीजें नहीं बल्कि इंसान को भेजने का था, जिसके लिए सेफ्टी बहुत महत्वपूर्ण होती है।
और इसी कड़ी में SPUTNIK 1 सेटेलाइट भेजने की अगले ही महीने 3 नवंबर को इन्होंने SPUTNIK 2 भी सफलतापूर्वक लॉन्च कर दी, लेकिन SPUTNIK 2 मिशन और इसके साथ ही इसमें इस्तेमाल की गई। सभी चीजें SPUTNIK 1 की तुलना में पूरी तरह से अलग थी। जहां SPUTNIK 1 सिर्फ 85 किलो का एक बॉस्केटबॉल के आकार का था, तो वहीं SPUTNIK 2 "508" किलो का एक भारी-भरकम स्पेस क्राफ्ट था। जिसमें सोलर रेडिएशन और कॉस्मिक रेस मापने के लिए
instruments लगाए गए थे। लेकिन इन सबसे बढ़कर SPUTNIK 2 की सबसे खास बात थी इसमें भेजा गया जिंदा प्राणी जी हां, आपने सही सुना SPUTNIK 2 मिशन में एक जानवर को भेजा गया था।
जिसका नाम था लाइका जी हां लाइका दरअसल लाइका एक डॉग था, जिसे रसिया के Moscow शहर की सड़कों से लाया गया था। लेकिन सवाल आता है कि सड़क किनारे के घूमते फिरते लावारिस इस डॉग को ही क्यों चुना गया। क्या वैज्ञानिकों को और कुत्ते नहीं मिल रहे थे। या रसिया में डॉग्स की कमी पड़ गई थी।
इसका जवाब मैं आपको आगे बताऊंगा। जितनी इंट्रस्टिंग कहानी लाइका को मिशन के लिए चुनने की है, उतनी ही इंटरेस्टिंग इसके नाम को लेकर भी है। दरअसल लाइका का पहले नाम KUDRAYAVKA था, लेकिन इसे चुनने के बाद जब इसे एक रेडियो इंटरव्यू में ले जाया गया, तब लाइका ने वहां पर bark किया। यानी कि भौंका जिसकी वजह से इसका नाम लाइका रख दिया गया।
लाइका का रसियन में मतलब होता है। बार्कर यानी की भौंकने वाला वैसे दोस्तों मैं आपको बता दूं कि लाइका को मिशन के लिए एक विकल्प के रूप में रखा गया था। क्योंकि ट्रेनिंग के वक्त जो दूसरा डॉग था। जिसका नाम अल्बीना था, उसने लाइका से भी बेहतर परफॉर्मेंस किया था।
लेकिन अल्बीना ने मिशन से पहले puppies को जन्म दिया, जिसकी वजह से अल्बीना की जगह लाइका को मिशन का हिस्सा बनाया गया। अब मैं आपको बताता हूं कि आखिर क्यों एक wild train dog को ना चुनते हुए सड़क के किनारे डॉग को मिशन के लिए क्यूं चुना गया। दरअसल सड़क पर या गली में घूमते डॉग में किसी भी सिचुएशन में जिंदा रहने की क्षमता ज्यादा होती है। उसे खाना या पानी ना मिले या गर्मी ज्यादा लगे तब भी किसी पालतू डॉग से वह ज्यादा देर तक टिका रह सकता है। क्योंकि वह पहले से ही ऐसी हार्ड कंडीशन यानी कि कठोर परिस्थितियों से गुजर चुका होता है।और इसलिए लाइका को इस मिशन के लिए चुना गया।
3 नवंबर 1957 को सुबह के 5:30 बजे लाइका को स्पेस सूट पहना के SPUTNIK 2 स्पेस क्रॉफ्ट में बिठाकर अंतरिक्ष में छोड़ दिया गया। स्पेस क्रॉफ्ट को लॉन्च होते वक्त राकेट की आवाज की वजह से लाइका की दिल की धड़कन 3 गुना तक बढ़ गई थी। तो वहीं वो सांस भी चार गुना तेजी से ले रही थी।
इस स्पेसक्राफ्ट में ऑक्सीजन, फूड, सैनिटेशन और पानी समेत तमाम चीजों का बंदोबस्त किया गया था। इसमें एक वीडियो कैमरा भी लगाया गया था ताकि लाइका की हलचल को रिकॉर्ड किया जाए।
इस स्पेसक्राफ्ट में वो सारे उपकरण लगाए गए थे। जिनकी मदद से ये पता लगाया जा सके, कि किसी लिविंग organism पर सोलर रेडिएशन Cosmic rays और ग्रेविटी जैसी चीजों का क्या असर पड़ता है। क्योंकि इस मिशन का असली मकसद ही यह जांचना था, ताकि जब किसी इंसान को अंतरिक्ष में भेजने की बारी आए तब इसकी तैयारी पहले से ही की जा सके। एक बहुत ही बड़ी जिम्मेदारी के साथ लाइक अंतरिक्ष में गई थी।
इस जिम्मेदारी ने ही लाइका को आज तक की सबसे फेमस डॉग का खिताब दिलाया। लेकिन लाइका जितनी फेमस हुई उससे कहीं ज्यादा दुख भरी थी उसकी अंतरिक्ष यात्रा की कहानी क्योंकि लाइका जिस तरह अंतरिक्ष में गई थी। उस तरह से वापस लौट कर नहीं आई। कई न्यूज एजेंसीज का कहना है कि लाइक ने 103 मिनट तक पृथ्वी को ऑर्बिट किया था।
लेकिन shield में आई खराबी की वजह से स्पेसक्राफ्ट में गर्मी बहुत तेजी से बढ़ने लगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि स्पेसक्राफ्ट के अंदर टेंपरेचर 90 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया था, जिसके कारण लाइका ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह पाई।
कई वैज्ञानिक और न्यूज़ आउटलेट्स का कहना है कि लाइका 4 से 5 दिन तक जिंदा रही थी। और जब स्पेसक्राफ्ट बहुत ज्यादा ओवरहीटेड हुआ तब उसकी मौत हो गई, लेकिन इसकी आज तक कोई भी पुख्ता जानकारी नहीं है कि आखिर लाइका कितनी देर तक जिंदा रही थीं।
लेकिन जो भी हुआ पर इसमें सोवियत सरकार की काफी बड़ी गलती थी। क्योंकि उन्होंने मिशन को बहुत ही ज्यादा हड़बड़ी में लांच किया था। दरअसल बोल्शेविक क्रांति की चलिस्वी सालगिरह नजदीक आ गई थी। और उन्हें इसी दिन मिशन लॉन्च करना था ताकि दुनिया को पता चल सके कि सोवियत कितनी बड़ी महाशक्ति है।
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि बोल्शेविक क्रांति वहीं घटना थी। जिसने सोवियत यूनियन जैसी महाशक्ति को जन्म दिया था। खैर जो भी हुआ पर दुर्भाग्य से लाइका ज्यादा दिन तक जिंदा नहीं रह पाई।
SPUTNIK 2 उसी महीने पूरी तरह से खराब हो गया और अगले 5 महीने ये ऐसे ही पृथ्वी को ऑर्बिट करता रहा और 14 अप्रैल 1958 को न्यूयॉर्क सिटी के ऊपर से उड़ते हुए ऐमेज़ॉन के क्षेत्र में जाकर गिर पड़ा। उस वक्त सोवियत यूनियन के विरोध में कई एनिमल सेव NGO ने विरोध किया।.
कई देशों ने भी आधिकारिक रूप से विरोध किया। कहा जाता है कि लाइका वो पहला डॉग नहीं थी जिसे सोवियत यूनियन ने अपने स्पेस प्रोग्राम के लिए बलि चढ़ाई बल्कि इससे पहले भी सोवियत यूनियन कई डॉग्स को मौत के घाट उतारा था। 2015 में रसिया की Moscow military facility में लाइका के सम्मान में उसका स्टेचू लगाया गया।
मार्च 2005 में नासा ने भी अपनी मार्स मिशन में 1 Creature का नाम लाइका रखा था। कई लेखकों और वैज्ञानिकों ने लाइका के ऊपर किताबे लिखी आज के वक्त में कई फेमस डॉक्युमेंट्रीज और वीडियोज आपको यूट्यूब और बाकी प्लेटफॉर्म्स पर देखने को मिल जाएंगी।
लाइका के बाद बहुत सारे डॉग्स यहां तक चिंपैंजी तक को अंतरिक्ष में भेजा गया, पर लाइका की जगह हमेशा के लिए सबसे स्पेशल रहेगी क्योंकि उसकी वजह से ही आगे के सब मिशन सफल हो सके। आज जो हम मून मार्स पर जाने की बात करते हैं। ये भी उसी की वजह से संभव हो पा रहा है।
आपको क्या लगता है कि क्या लाइका आज के समय होने वाले मिशन में कहीं ना कहीं अपनी छाप रखती है। कि नहीं कमेंट करके बताइएगा।

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